मोरारजी देसाई : एक संपूर्ण जीवन परिचय

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मोरारजी देसाई : एक संपूर्ण जीवन परिचय



मोरारजी देसाई – जीवन-परिचय

मोरारजी रणछोड़जी देसाई का जन्म 29 फरवरी 1896 को गुजरात के बुलसर (अब वलसाड) जिले के भदेली नामक गाँव में हुआ था। उनके पिता रणछोड़जी देसाई एक स्कूल शिक्षक थे और माता वृजाबेन देसाई एक धार्मिक एवं सरल स्वभाव की महिला थीं। बचपन से ही मोरारजी देसाई अत्यंत अनुशासित, परिश्रमी और सत्यवादी थे। प्राथमिक शिक्षा गाँव में पूरी करने के बाद उन्होंने आगे की पढ़ाई बड़ोदा और बाँबे (मुंबई) में की। पढ़ाई के बाद वे बॉम्बे प्रेसीडेंसी में प्रशासनिक सेवा में नियुक्त हुए, परंतु स्वभाव से न्यायप्रिय होने के कारण उन्हें कई सरकारी कार्यप्रणालियों से असहमति थी। आखिरकार उन्होंने नौकरी छोड़ दी और महात्मा गांधी के आह्वान पर स्वतंत्रता संग्राम में कूद पड़े।

स्वतंत्रता आंदोलन में मोरारजी देसाई की भूमिका अत्यंत सक्रिय रही। उन्होंने नमक सत्याग्रह, व्यक्तिगत सत्याग्रह और अन्य आंदोलनों में बढ़–चढ़कर हिस्सा लिया। इसके कारण उन्हें अनेक बार जेल भी जाना पड़ा। गांधीजी के विचारों—सत्य, अहिंसा, अनुशासन और सादगी—का प्रभाव उनके जीवन पर गहराई से पड़ा। वे जीवनभर इन सिद्धांतों का पालन करते रहे।

स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद उनका राजनीतिक जीवन और अधिक व्यापक हुआ। 1946 में वे बॉम्बे स्टेट के होम मिनिस्टर बने और 1952 से 1956 तक उसी राज्य के मुख्यमंत्री रहे। उनके नेतृत्व में बॉम्बे स्टेट में प्रशासनिक सुधार, कानून व्यवस्था और विकास कार्यों को बढ़ावा मिला। 1956 में वे भारत के वित्त मंत्री नियुक्त किए गए। अपने कार्यकाल में उन्होंने वित्तीय अनुशासन, भ्रष्टाचार-निरोध और पारदर्शिता पर विशेष जोर दिया। 1967 में उन्हें देश का उपप्रधानमंत्री बनाया गया। उनकी सादगी और कठोर अनुशासन के कारण लोग उन्हें कठोर प्रशासक के रूप में जानते थे।

भारत के राजनीतिक इतिहास में सबसे महत्वपूर्ण क्षण तब आया जब 1977 में आपातकाल समाप्त होने के बाद जनता पार्टी की सरकार बनी और मोरारजी देसाई भारत के चौथे तथा प्रथम गैर-कांग्रेसी प्रधानमंत्री चुने गए। उनका प्रधानमंत्री कार्यकाल 1977 से 1979 तक रहा। इस दौरान उन्होंने लोकतांत्रिक मूल्यों को पुनर्स्थापित किया, प्रेस की स्वतंत्रता को बहाल किया और आपातकाल के दौरान हुए दुरुपयोगों की जांच की शुरुआत कराई। वे विदेश नीति में शांति और संवाद को महत्व देते थे। पाकिस्तान, चीन और अमेरिका सहित कई देशों के साथ उन्होंने संतुलित संबंध बनाए रखने का प्रयास किया।

मोरारजी देसाई का निजी जीवन अत्यंत सादगीपूर्ण था। वे योग, प्राकृतिक चिकित्सा और सात्विक भोजन के समर्थक थे। नशामुक्ति उनके जीवन का अभिन्न हिस्सा था। वे सुबह चार बजे उठते, योग करते और नियमित दिनचर्या का पालन करते। उनकी ईमानदारी इतनी प्रसिद्ध थी कि विरोधी भी उनकी सत्यनिष्ठा पर प्रश्न नहीं उठाते थे।

1991 में उन्हें भारत के सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न से सम्मानित किया गया। 10 अप्रैल 1995 को 99 वर्ष की आयु में उन्होंने मुंबई में अंतिम सांस ली।

मोरारजी देसाई भारतीय राजनीति के उन दुर्लभ नेताओं में गिने जाते हैं जिनका पूरा जीवन सिद्धांतों और सत्यनिष्ठा पर आधारित था। उन्होंने न केवल स्वतंत्रता आंदोलन में योगदान दिया, बल्कि स्वतंत्र भारत की राजनीति को ईमानदारी और पारदर्शिता का एक उत्तम आदर्श भी दिया।


मोरारजी देसाई – प्रारंभिक जीवन 

मोरारजी रणछोड़जी देसाई का जन्म 29 फरवरी 1896 को गुजरात के वलसाड (तत्कालीन बुलसर) जिले के भदेली नामक छोटे से गाँव में हुआ था। वे एक सादा, धार्मिक और शिक्षित परिवार से थे। उनके पिता रणछोड़जी देसाई स्थानीय स्कूल में शिक्षक थे और माता वृजाबेन देसाई एक गृहिणी थीं, जिनका प्रभाव मोरारजी के जीवन पर गहरा पड़ा। परिवार आर्थिक रूप से बहुत सम्पन्न नहीं था, परंतु शिक्षा, ईमानदारी और अनुशासन को परिवार में अत्यधिक महत्व दिया जाता था। इसी वातावरण में मोरारजी का स्वभाव बचपन से ही गंभीर, अनुशासित और कर्तव्यनिष्ठ बनता गया।

बचपन में मोरारजी शांत स्वभाव के थे। उन्हें पढ़ाई और आत्मविकास में विशेष रुचि थी। वे स्वभाव से ही निडर और दृढ़ निश्चयी थे, जो आगे उनके राजनीतिक जीवन की बड़ी पहचान बन गई। उनकी प्रारंभिक शिक्षा गाँव के स्कूल में हुई। पढ़ाई में वे हमेशा तेज थे और किसी भी विषय को गहराई से समझने की कोशिश करते थे। उनके पिता एक सख्त शिक्षक थे, इसलिए मोरारजी के भीतर अनुशासन की भावना बचपन से ही गहरी होती चली गई।

उनकी माध्यमिक शिक्षा गुजरात के बारडोली के स्कूल में हुई। यहां उन्होंने न केवल पढ़ाई में उत्कृष्टता दिखाई, बल्कि नेतृत्व क्षमता भी विकसित की। स्कूल में वे प्रायः ऐसे छात्र रहे जो अपनी ईमानदारी और मजबूत इच्छाशक्ति के लिए पहचाने जाते थे। उनकी यही गुण आगे चलकर उनके पूरे राजनीतिक जीवन की नींव बने।

मोरारजी देसाई की उच्च शिक्षा बॉम्बे (अब मुंबई) में हुई। उन्होंने विल्सन कॉलेज से स्नातक की शिक्षा पूरी की। यह समय उनके जीवन के निर्माण का महत्वपूर्ण चरण था। कॉलेज में पढ़ते समय उन्होंने पश्चिमी शिक्षा तो प्राप्त की, लेकिन उनके मन में भारतीय संस्कृति और नैतिक मूल्यों के प्रति अत्यधिक सम्मान बना रहा। पढ़ाई के दौरान वे अत्यंत सरल और संयमित जीवन जीते थे। विलासिता से दूर रहना, समय का सदुपयोग करना और हर कार्य को पूरी निष्ठा से करना उनका स्वभाव बन चुका था।

स्नातक के बाद मोरारजी ने अपना करियर ब्रिटिश शासन के तहत प्रशासनिक सेवा से शुरू किया। वे 1918 में बॉम्बे प्रेसीडेंसी में डेप्युटी कलेक्टर नियुक्त हुए। यह पद उस समय बहुत प्रतिष्ठित माना जाता था। वे अपने काम में बेहद अनुशासित, ईमानदार और सख्त प्रशासक के रूप में जाने जाने लगे। उनकी कठोरता के कारण कभी-कभी जनसामान्य उन्हें कठोर प्रशासक समझ बैठते थे, लेकिन वे अन्याय और भ्रष्टाचार के बिल्कुल खिलाफ थे। इस नौकरी के दौरान उनमें प्रशासनिक दक्षता, निर्णय क्षमता और नेतृत्व की कला और भी निखरी, जो आगे चलकर उनके राजनीतिक सफर में अत्यंत उपयोगी साबित हुई।

हालाँकि वे प्रशासनिक सेवा में सफलतापूर्वक काम कर रहे थे, लेकिन उनके मन में राष्ट्रभक्ति की भावना लगातार बढ़ रही थी। उस समय देश में आज़ादी की लहर तेज हो रही थी। महात्मा गांधी का सत्याग्रह और स्वदेशी आंदोलन देश को एक नई दिशा दे रहा था। मोरारजी देसाई गांधीजी को बेहद आदर की दृष्टि से देखते थे और उनके सिद्धांतों — सत्य, अहिंसा, स्वच्छ आचरण, और सादगी — से गहराई से प्रभावित थे।

ब्रिटिश शासन में काम करते हुए भी मोरारजी के मन में यह भावना रहती थी कि देश को आज़ाद होना चाहिए। अंततः राष्ट्रभक्ति उनकी नौकरी पर भारी पड़ गई और 1930 के आसपास उन्होंने सरकारी सेवा से त्यागपत्र दे दिया। यह त्यागपत्र उनके जीवन का निर्णायक मोड़ था। नौकरी छोड़ना आसान नहीं था, लेकिन देश के लिए कुछ करने की तीव्र इच्छा ने उन्हें राजकीय सेवा से अलग कर दिया।

सरकारी नौकरी छोड़ने के बाद वे पूर्णतः स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय हो गए। उन्होंने नमक सत्याग्रह में भाग लिया और गांधीजी के “सत्य” तथा “सेवा” के मार्ग पर पूरी निष्ठा के साथ चल पड़े। उनके शुरुआती राजनीतिक कदमों ने ही यह स्पष्ट कर दिया था कि वे सत्ता या पद के लिए नहीं, बल्कि सिद्धांतों और देशहित के लिए राजनीति में आए हैं।

मोरारजी देसाई का प्रारंभिक जीवन, चाहे वह परिवारिक वातावरण हो, शिक्षा, प्रशासनिक सेवा, या स्वतंत्रता आंदोलन में प्रवेश — हर चरण में उनकी व्यक्तित्व की मुख्य विशेषताएँ स्पष्ट दिखाई देती हैं: ईमानदारी, अनुशासन, दृढ़ संकल्प, और सिद्धांतों के प्रति अटूट निष्ठा। इन मूल्यों ने आगे उन्हें भारत के सबसे कद्दावर, सख्त और नैतिक नेताओं में शामिल कर दिया।


मोरारजी देसाई का स्वतंत्रता संग्राम में योगदान 

मोरारजी रणछोड़जी देसाई भारत के स्वतंत्रता आंदोलन के उन प्रमुख नेताओं में से एक थे, जिन्होंने प्रशासनिक सेवा के प्रतिष्ठित पद को छोड़कर राष्ट्र की स्वतंत्रता के लिए अपना संपूर्ण जीवन समर्पित कर दिया। उनका योगदान केवल आंदोलनों में भाग लेने तक सीमित नहीं था, बल्कि उन्होंने सत्य, अहिंसा और सिद्धांतों पर आधारित राजनीतिक चरित्र प्रस्तुत किया। उनके स्वतंत्रता संग्राम में योगदान को समझने के लिए उनके प्रारंभिक जीवन, संघर्षों और आंदोलनों में भागीदारी को विस्तार से जानना आवश्यक है।

मोरारजी देसाई का जन्म 29 फरवरी 1896 को गुजरात के भदेली गाँव में हुआ था। उनके पिता रणछोड़जी देसाई स्कूल शिक्षक थे और माता वृजाबेन सरल और धार्मिक विचारों वाली थीं। बचपन से ही मोरारजी अनुशासन, ईमानदारी और सादगी से प्रभावित थे। शिक्षा पूरी करने के बाद वे बॉम्बे प्रेसीडेंसी में सिविल सेवा में शामिल हुए। अपने प्रारंभिक जीवन में वे एक कठोर और ईमानदार प्रशासक के रूप में प्रसिद्ध हुए, परंतु जैसे-जैसे वे ब्रिटिश शासन की नीतियों और भारतीयों पर हो रहे अत्याचारों को देखने लगे, उनका मन प्रशासनिक नौकरी से हटने लगा।

नौकरी छोड़कर स्वतंत्रता संग्राम में प्रवेश

मोरारजी देसाई ने 1930 के आसपास प्रशासनिक सेवा से इस्तीफा दे दिया और महात्मा गांधी के नेतृत्व में चल रहे आजादी के संघर्ष में शामिल हो गए। यह वह समय था जब भारत में अंग्रेजी शासन के खिलाफ असंतोष बढ़ रहा था और गांधीजी सत्याग्रह, स्वदेशी और असहयोग जैसे आंदोलनों के माध्यम से जनजागरण कर रहे थे। मोरारजी देसाई गांधीजी की नीतियों और विचारों से अत्यंत प्रभावित थे। उन्होंने सत्य, अहिंसा और सादगी को अपने जीवन का आधार बना लिया।

नमक सत्याग्रह में भागीदारी

1930 में गांधीजी ने नमक कानून के खिलाफ ऐतिहासिक दांडी मार्च शुरू किया। इस आंदोलन ने पूरे देश में ब्रिटिश सत्ता के खिलाफ आग भड़का दी। मोरारजी देसाई ने भी गुजरात में नमक सत्याग्रह में सक्रिय भाग लिया। उन्होंने ब्रिटिश अधिकारियों के खिलाफ बड़े पैमाने पर आंदोलन का नेतृत्व किया। इस अवधि में वे कई बार गिरफ्तार हुए और जेल भी भेजे गए। नमक सत्याग्रह के दौरान उन्होंने जनता को संगठित किया, सभाएँ कीं, ब्रिटिश कानूनों का बहिष्कार किया और सत्याग्रहियों को प्रेरित किया। इस आंदोलन में उनकी भूमिका ने उन्हें गुजरात के प्रमुख स्वतंत्रता सेनानियों में स्थापित कर दिया।

सविनय अवज्ञा आंदोलन में भूमिका

1932 में गांधीजी ने सविनय अवज्ञा आंदोलन को पुनः तेज किया। इस समय मोरारजी देसाई ने विशेष रूप से ब्रिटिश प्रशासनिक नियमों और कानूनों का विरोध किया। उन्होंने सरकारी बैठकों, आदेशों और अंग्रेजी वस्तुओं का बहिष्कार कराया। उनकी बढ़ती लोकप्रियता और प्रभाव को देखते हुए ब्रिटिश सरकार ने उन्हें एक बड़ी चुनौती माना। इसी कारण उन्हें लंबे समय तक जेल में रखा गया। जेल में भी उन्होंने अपने सिद्धांत और अनुशासन को नहीं छोड़ा और अन्य कैदियों को प्रेरित करते रहे।

भारत छोड़ो आंदोलन (1942)

मोरारजी देसाई के स्वतंत्रता संग्राम में योगदान का सबसे महत्वपूर्ण दौर भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान आता है। 1942 में महात्मा गांधी ने ‘करो या मरो’ का नारा दिया और ब्रिटिश शासन को तत्काल भारत छोड़ने की मांग की। यह आंदोलन देशव्यापी पैमाने पर फैला और ब्रिटिश सरकार बुरी तरह हिल गई।

मोरारजी देसाई इस आंदोलन में गुजरात और बॉम्बे क्षेत्र में प्रमुख नेता थे। वे आंदोलन के संचालन, नेताओं के बीच समन्वय और जनता को संगठित करने में सक्रिय रहे। ब्रिटिश अधिकारियों ने उन्हें सबसे प्रभावशाली और ‘खतरनाक’ नेताओं में गिना और आंदोलन शुरू होते ही गिरफ्तार कर लिया। उन्हें बिना मुकदमा चलाए लंबे समय तक जेल में रखा गया। जेल में उन्होंने कठोर परिस्थितियों के बावजूद हिम्मत नहीं हारी। इसी दौर में उनकी नेतृत्व क्षमता और दृढ़ता और भी मजबूत हुई।

जन-जागरण और संगठन क्षमता

स्वतंत्रता संग्राम के दौरान मोरारजी देसाई ने हजारों युवाओं को आजादी के लिए प्रेरित किया। वे लोगों को बताते थे कि स्वतंत्रता केवल राजनीतिक अधिकार नहीं बल्कि आत्म-सम्मान का प्रतीक है। उन्होंने ग्रामीण भारत में जाकर जनता को ब्रिटिश शासन की नीतियों से अवगत कराया। उनकी भाषण शैली सरल, प्रभावी और तार्किक थी। वे जहां भी जाते, लोग बड़ी संख्या में उनके विचार सुनने के लिए एकत्रित होते थे।

स्वतंत्रता के बाद भी योगदान की निरंतरता

यद्यपि यह स्वतंत्रता संग्राम का हिस्सा नहीं माना जाता, लेकिन मोरारजी देसाई का राष्ट्र-निर्माण में योगदान स्वतंत्रता के बाद भी जारी रहा। उन्होंने एक ईमानदार राजनेता और प्रशासक के रूप में भारत के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उनका राजनीतिक चरित्र स्वतंत्रता आंदोलन की देन था जिसने उन्हें सत्यनिष्ठा और आदर्शवाद की राह दिखाई।


मोरारजी देसाई : राजनीतिक करियर 

मोरारजी रणछोड़जी देसाई भारतीय राजनीति के उन महान नेताओं में गिने जाते हैं जिन्होंने प्रशासनिक दक्षता, नैतिक मूल्यों, ईमानदारी, और गांधीवादी विचारधारा के आधार पर भारतीय शासन–प्रणाली को नए मार्ग दिखाए। उनका राजनीतिक करियर भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के प्रारंभिक दिनों से शुरू होकर 1970 के दशक के अंत तक फैला रहा। वे अपने सिद्धांतों से समझौता न करने के लिए जाने जाते थे। 1977 में वे भारत के चौथे प्रधानमंत्री बने और स्वतंत्र भारत के प्रथम गैर–कांग्रेसी प्रधानमंत्री के रूप में उभरे।

उनका राजनीतिक सफर प्रशासनिक सेवा से लेकर प्रधानमंत्री पद तक का अद्भुत उदाहरण है। नीचे उनके पूरे राजनीतिक करियर का कालक्रम, घटनाएँ, नीतियाँ और राजनीतिक संघर्ष विस्तृत रूप में प्रस्तुत हैं।


1. राजनीति में प्रवेश से पहले की पृष्ठभूमि

मोरारजी देसाई का राजनीतिक करियर सीधे स्वतंत्रता आंदोलन से शुरू नहीं हुआ। शुरुआती वर्षों में उन्होंने प्रशासनिक विभाग में काम किया। वे बॉम्बे प्रेसीडेंसी सिविल सर्विस में डिप्टी कलेक्टर थे। इस पद पर रहते हुए उन्हें शासन और प्रशासन का व्यापक अनुभव मिला। लेकिन ब्रिटिश शासन की नीतियों और भारतीय जनता पर अन्याय को देखकर उनका मन धीरे-धीरे राजनीतिक दिशा की ओर मुड़ने लगा।

1930 के आसपास उन्होंने अपनी नौकरी छोड़ दी, जो कि उस समय एक बड़ा और साहसिक कदम माना जाता था। इसके बाद वे पूर्ण रूप से स्वतंत्रता संग्राम में शामिल हो गए।


2. स्वतंत्रता संग्राम और राजनीतिक सक्रियता

मोरारजी देसाई कांग्रेस पार्टी के सक्रिय सदस्य बने। वे महात्मा गांधी से गहरा प्रभावित थे और सत्य–अहिंसा को राजनीतिक जीवन का मूल आधार मानते थे।

नमक सत्याग्रह और सविनय अवज्ञा आंदोलन में भागीदारी

1930 के नमक सत्याग्रह में उन्होंने सक्रिय भूमिका निभाई। बाद में 1932 के सविनय अवज्ञा आंदोलन तथा भारत छोड़ो आंदोलन (1942) में भी वे जेल गए।

उनकी संगठन क्षमता, कठोर अनुशासन और प्रशासनिक समझ ने कांग्रेस पार्टी में उन्हें जल्दी उभरने का अवसर दिया।


3. प्रांतीय राजनीति में उदय (1937–1952)

कांग्रेस सरकारों में जिम्मेदारियाँ

1937 में जब प्रांतीय चुनाव हुए और कांग्रेस की सरकार बनी, तो मोरारजी देसाई को बॉम्बे प्रेसीडेंसी में महत्वपूर्ण जिम्मेदारियाँ मिलीं।

1946 : बॉम्बे प्रांत के होम मिनिस्टर

स्वतंत्रता से ठीक पहले, 1946 में उन्हें बॉम्बे स्टेट का गृह मंत्री बनाया गया।
गृह विभाग की जिम्मेदारी अत्यंत महत्वपूर्ण होती है—कानून व्यवस्था, पुलिस व्यवस्था और आंतरिक सुरक्षा।

वे कठोर प्रशासक के रूप में प्रसिद्ध होने लगे। उनके कार्यकाल में अपराध पर नियंत्रण और प्रशासनिक सुधारों की सराहना हुई।


4. बॉम्बे राज्य के मुख्यमंत्री (1952–1956)

स्वतंत्रता के बाद हुए पहले विधानसभा चुनावों में मोरारजी देसाई को 1952 में बॉम्बे राज्य का मुख्यमंत्री बनाया गया।

मुख्यमंत्री के रूप में प्रमुख कार्य

  • भ्रष्टाचार के खिलाफ कठोर कदम
  • सरकारी कर्मचारियों में अनुशासन लागू
  • शिक्षा और कृषि क्षेत्र में सुधार
  • औद्योगिक विकास के लिए नीतियाँ
  • प्रशासन में पारदर्शिता

वे कठोर फैसले लेने के लिए जाने जाते थे। कई बार उनके कठोर अनुशासनात्मक कदमों से कर्मचारी संघों से टकराव भी हुआ, परन्तु उनकी प्रतिष्ठा “इमानदार प्रशासक” के रूप में लगातार बढ़ती रही।

1956 में राज्यों के पुनर्गठन के बाद बॉम्बे राज्य दो भागों—महाराष्ट्र और गुजरात—में बँट गया। इस बंटवारे ने उनके मुख्यमंत्री पद को समाप्त कर दिया और वे राष्ट्रीय राजनीति में आ गए।


5. राष्ट्रीय राजनीति में आगमन (1956–1966)

1956 : केंद्रीय मंत्रिमंडल में प्रवेश

प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने उन्हें केंद्रीय मंत्रिमंडल में शामिल किया और वित्त मंत्रालय की जिम्मेदारी दी।

वित्त मंत्री के रूप में कदम

  • सरकारी खर्च को नियंत्रित करने पर जोर
  • राजकोषीय अनुशासन
  • कर प्रणाली में सुधार
  • योजनाओं के लिए संसाधन जुटाना

वे एक ऐसे वित्त मंत्री के रूप में जाने गए जो फिजूलखर्ची के पूर्ण विरोधी थे और आर्थिक अनुशासन को सर्वोपरि मानते थे।


6. प्रधानमंत्री पद की दौड़ में (1964–1966)

1964 में नेहरू की मृत्यु के बाद मोरारजी देसाई प्रधानमंत्री पद के संभावित उम्मीदवार थे, लेकिन कांग्रेस पार्टी ने लाल बहादुर शास्त्री को चुना।

शास्त्री जी की मृत्यु के बाद 1966 में फिर से प्रधानमंत्री पद के लिए मोरारजी देसाई और इंदिरा गांधी दोनों प्रमुख दावेदार बने।
कांग्रेस के बहुमत ने इंदिरा गांधी को चुना।

यह मोड़ भारतीय राजनीति में महत्वपूर्ण था, क्योंकि आगे चलकर यही नेतृत्व–संगर्ष मोरारजी देसाई के इंदिरा गांधी से मतभेद का आधार बना।


7. उपप्रधानमंत्री और वित्त मंत्री (1967–1971)

1967 में मोरारजी देसाई को इंदिरा गांधी सरकार में उपप्रधानमंत्री और पुनः वित्त मंत्री नियुक्त किया गया।

प्रमुख कार्य:

  • कर सुधार
  • मितव्ययिता की नीति
  • बचत और उत्पादन को प्रोत्साहन
  • विदेशी निवेश पर संतुलित दृष्टिकोण

हालांकि राजनीतिक स्तर पर इंदिरा गांधी और देसाई के बीच मतभेद गहराते गए—विशेषतः अर्थनीति और शासन शैली को लेकर।

1971 में इंदिरा गांधी ने अपने विरोधियों से छुटकारा पाने के लिए मंत्रिमंडल में फेरबदल किया और मोरारजी देसाई को हटा दिया। यह उनकी कांग्रेस से दूरी की शुरुआत थी।


8. कांग्रेस से अलगाव और विपक्ष की राजनीति (1971–1975)

मोरारजी देसाई ने इंदिरा गांधी की नीतियों—जैसे बैंक राष्ट्रीयकरण और प्रिवी पर्स खत्म करने—का विरोध किया।
1971 के चुनावों में कांग्रेस (O) के रूप में इंदिरा गांधी विरोधी गुट बना, जिसमें मोरारजी देसाई प्रमुख नेता थे।

लोकनायक जयप्रकाश नारायण (JP) का सहयोग

1974–75 में बिहार आंदोलन और देशव्यापी “संपूर्ण क्रांति आंदोलन” से देश की राजनीति में बड़ा बदलाव आया।
मोरारजी देसाई, जयप्रकाश नारायण के साथ मिलकर इंदिरा गांधी के खिलाफ राजनीतिक संघर्ष का मुख्य चेहरा बने।


9. आपातकाल का विरोध (1975–1977)

25 जून 1975 को इंदिरा गांधी ने देश में आपातकाल घोषित किया।
मोरारजी देसाई को भी अन्य विपक्षी नेताओं की तरह गिरफ्तार कर लिया गया।

लगभग 19 महीनों तक जेल में रहने के बाद जब 1977 में चुनाव की घोषणा हुई, तो पूरा विपक्ष एकजुट हो गया।


10. जनता पार्टी का गठन (1977)

देश में पहली बार जनता पार्टी बनाई गई जिसमें:

  • जनसंघ
  • कांग्रेस (O)
  • भारतीय लोकदल
  • समाजवादी दल

सभी एकजुट हुए।
मोरारजी देसाई जनता पार्टी के वरिष्ठतम और सर्वाधिक अनुभवी नेता थे।

1977 के आम चुनावों में जनता पार्टी ने ऐतिहासिक जीत हासिल की और मोरारजी देसाई भारत के पहले गैर-कांग्रेसी प्रधानमंत्री बने।


11. प्रधानमंत्री के रूप में कार्यकाल (1977–1979)

उनके कार्यकाल की प्रमुख उपलब्धियाँ

1. लोकतंत्र की पुनर्स्थापना

आपातकाल में हुए दुरुपयोग की जांच के लिए
शाह आयोग का गठन।

2. प्रेस की स्वतंत्रता वापसी

सेंसरशिप हटाई गई, प्रेस की आजादी को मजबूत किया।

3. राजनीतिक कैदियों की रिहाई

आपातकाल में गिरफ्तार किए गए हजारों कार्यकर्ताओं को मुक्त किया।

4. विदेश नीति

  • पाकिस्तान और चीन के साथ संबंध सुधारने का प्रयास
  • विश्व शांति और परमाणु संयम की नीति
  • नेपाल और बांग्लादेश के साथ सहयोग

5. प्रशासनिक सुधार

  • सरकारी खर्च कम करने की मुहिम
  • भ्रष्टाचार-रोधी कदम
  • जनता की समस्याओं के समाधान के लिए सरल प्रक्रियाएँ

प्रधानमंत्री के रूप में चुनौतियाँ

1. जनता पार्टी का आंतरिक संघर्ष

जनता पार्टी कई दलों का मिश्रण थी—विचारधारा में भारी अंतर था।
आरएसएस की सदस्यता को लेकर विवाद बढ़ा और सरकार अस्थिर होती गई।

2. आर्थिक चुनौतियाँ

मुद्रास्फीति, बेरोजगारी और खाद्यान्न की कमी जैसी समस्याएँ सामने थीं।

3. चरन सिंह–देसाई विवाद

उपप्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह से उनका राजनीतिक टकराव सार्वजनिक हो गया।
1979 में सरकार अल्पमत में आ गई और देसाई ने इस्तीफा दे दिया।

इस प्रकार जनता पार्टी की पहली सरकार दो साल से भी कम समय में गिर गई।


12. सक्रिय राजनीति से संन्यास (1979–1995)

इस्तीफा देने के बाद मोरारजी देसाई ने राजनीति से दूरी बना ली।
उन्होंने अपना समय योग, प्राकृतिक चिकित्सा और सामाजिक कार्यों में बिताया।
1995 में 99 वर्ष की आयु में उनका निधन हो गया।


समग्र विश्लेषण

मोरारजी देसाई का राजनीतिक करियर लगभग 50 वर्षों तक चला और इसमें कई चरण शामिल थे—

  • स्वतंत्रता संग्राम
  • प्रांतीय सरकार
  • मुख्यमंत्री
  • केंद्रीय मंत्री
  • उपप्रधानमंत्री
  • प्रधानमंत्री

वे भारतीय राजनीति में नैतिकता, पारदर्शिता और अनुशासन के प्रतीक माने जाते हैं।
वे ऐसे नेता थे जिन्होंने सत्ता की राजनीति पर मूल्यों और सिद्धांतों को प्राथमिकता दी।


मोरारजी देसाई : भारत के प्रधानमंत्री (1977–1979) – 

भारत के लोकतांत्रिक इतिहास में मोरारजी रणछोड़जी देसाई का नाम एक ऐसे नेता के रूप में दर्ज है, जिन्होंने राजनीतिक सिद्धांतों, नैतिक मूल्यों और प्रशासनिक ईमानदारी को सर्वोच्च प्राथमिकता दी। वे ऐसे पहले भारतीय प्रधानमंत्री बने जो कांग्रेस पार्टी से नहीं थे। उनका प्रधानमंत्रित्व काल अपेक्षाकृत छोटा रहा, परंतु भारतीय राजनीति में उनकी भूमिका तथा आपातकाल के बाद की पुनःस्थापना प्रक्रिया में उनका योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। 1977 से 1979 के बीच का उनका शासनकाल भारतीय लोकतंत्र के इतिहास का एक निर्णायक दौर था, जिसने देश को राजनीतिक अस्थिरता, परिवर्तन और लोकतांत्रिक पुनर्जीवन का अनुभव कराया।

1. जीवन पृष्ठभूमि और राजनीतिक यात्रा की शुरुआत

मोरारजी देसाई का जन्म 29 फरवरी 1896 को गुजरात के वलसाड जिले के भदेली गाँव में हुआ था। उनका परिवार साधारण शिक्षक परिवार था, जिसके कारण बचपन से ही उन्हें अनुशासन और मूल्य-आधारित जीवन जीने की प्रेरणा मिली। उनके पिता रणछोड़जी देसाई एक शिक्षक थे, जिनकी कठोर दिनचर्या और सत्यनिष्ठा ने मोरारजी के व्यक्तित्व पर गहरा प्रभाव डाला। प्रारंभिक शिक्षा पूरी करने के बाद उन्होंने प्रशासनिक सेवा में नौकरी की, जहाँ वे महाराष्ट्र के विभिन्न क्षेत्रों में डिप्टी कलेक्टर के रूप में कार्यरत रहे। परंतु ब्रिटिश शासन की नीतियों से असंतोष के चलते उन्होंने नौकरी से इस्तीफा दे दिया और स्वतंत्रता आंदोलन में शामिल हो गए।

उन्होंने महात्मा गांधी की विचारधारा को अपनाया और नमक सत्याग्रह, भारत छोड़ो आंदोलन सहित बड़े आंदोलनों में सक्रिय भूमिका निभाई। कई बार जेल गए लेकिन उनके विचारों में दृढ़ता और अनुशासन कभी कम नहीं हुआ। स्वतंत्रता के बाद भी वे कांग्रेस के प्रमुख नेताओं में गिने जाते थे और उनकी प्रशासनिक क्षमता के कारण उन्हें विभिन्न महत्वपूर्ण पद मिले।

2. स्वतंत्रता के बाद उनका राजनीतिक उत्थान

स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद मोरारजी देसाई ने एक प्रशासक, मंत्री और मुख्यमंत्री के रूप में अपनी क्षमता साबित की। 1952 में वे बॉम्बे राज्य के मुख्यमंत्री बने और अपने कठोर प्रशासन और निर्णय क्षमता के लिए प्रसिद्ध हुए। वे भ्रष्टाचार और पक्षपात के पूर्णतः विरोधी थे। 1956 से 1964 तक वे भारत के वित्त मंत्री रहे। वित्त मंत्री के रूप में उनका कार्यकाल महत्वपूर्ण आर्थिक सुधारों के लिए जाना जाता है। उन्होंने उच्च बचत दर, नियंत्रित सरकारी खर्च और कठोर राजकोषीय अनुशासन पर बल दिया।

वे 1967 में इंदिरा गांधी सरकार में उप प्रधानमंत्री और वित्त मंत्री बने, परंतु इंदिरा गांधी के साथ वैचारिक मतभेद बढ़ते गए। 1969 में कांग्रेस में विभाजन हुआ, जहाँ मोरारजी देसाई कांग्रेस (ओ) के प्रमुख नेता बने। 1971 के चुनाव में कांग्रेस (ओ) को करारी हार मिली, लेकिन मोरारजी देसाई ने अपनी राजनीतिक यात्रा नहीं रोकी।

3. आपातकाल और जनता पार्टी का गठन

1975 में प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी द्वारा लगाए गए आपातकाल ने देश की राजनीति में एक बड़ी हलचल पैदा की। आपातकाल के दौरान विपक्ष के कई नेता गिरफ्तार हुए, जिनमें मोरारजी देसाई भी थे। अपने कठोर व्यक्तित्व और न झुकने वाले स्वभाव के कारण वे आपातकाल के सबसे प्रमुख विरोधियों में शामिल थे।

जब 1977 में आपातकाल हटाया गया और चुनाव की घोषणा हुई, तब जनता पार्टी का गठन हुआ — जिसमें कांग्रेस (ओ), जनसंघ, समाजवादी दल, भारतीय लोक दल आदि एकजुट हुए। मोरारजी देसाई इस गठबंधन का चेहरा बने।

1977 के चुनाव में जनता पार्टी ने ऐतिहासिक जीत हासिल की और पहली बार भारत में गैर-कांग्रेसी सरकार बनी। प्रधानमंत्री के पद के लिए कई दावेदार थे, लेकिन आंतरिक लोकतांत्रिक मतदान में मोरारजी देसाई को नेता चुना गया।

4. प्रधानमंत्री के रूप में मोरारजी देसाई (1977–1979)

27 मार्च 1977 को मोरारजी देसाई ने भारत के चौथे प्रधानमंत्री के रूप में शपथ ली। उनका कार्यकाल कई दृष्टियों से ऐतिहासिक रहा क्योंकि वे एक गठबंधन सरकार के पहले प्रधानमंत्री थे।

(क) लोकतंत्र की बहाली और संस्थाओं का पुनर्जीवन

आपातकाल की पृष्ठभूमि में लोकतंत्र को लेकर जनता का भरोसा डगमगा गया था। देश में प्रेस पर नियंत्रण, असहमति पर प्रतिबंध और नागरिक अधिकारों पर अंकुश लग चुका था।

मोरारजी देसाई की सरकार ने सबसे पहले इन गलतियों को सुधारने के लिए निम्न कार्य किए:

  • प्रेस की पूर्ण स्वतंत्रता बहाल की।
  • राजनीतिक बंदियों को रिहा किया।
  • आपातकाल के दुरुपयोग की जांच के लिए शाह आयोग का गठन किया।
  • नागरिक स्वतंत्रताओं को फिर से मजबूत किया।
  • संविधान के 42वें संशोधन में किए गए विवादित परिवर्तन हटाने की प्रक्रिया शुरू की।

(ख) विदेश नीति में संतुलन और शांति का संदेश

विदेश नीति में मोरारजी देसाई का दृष्टिकोण स्पष्ट रूप से अहिंसा, शांति और बातचीत पर आधारित था। उन्होंने पाकिस्तान, बांग्लादेश और चीन सहित पड़ोसी देशों के साथ संवाद बढ़ाया।

उनकी सबसे बड़ी उपलब्धियों में से एक यह मानी जाती है कि उन्होंने पाकिस्तान के प्रधानमंत्री जियाउल हक़ के साथ संबंध सुधारे और भारत-पाक tensions कम किए। वे भारत की परमाणु नीति को लेकर अत्यंत सतर्क थे और उन्होंने शांति की दिशा में अधिक जोर दिया।

(ग) आर्थिक नीतियाँ और सुधार

मोरारजी देसाई एक पारंपरिक आर्थिक विचारधारा के समर्थक थे। वे सरकारी खर्च में सादगी, खपत में कमी और आत्मनिर्भरता को बढ़ावा देते थे।

उनके कार्यकाल में:

  • सरकारी खर्च कम करने पर जोर
  • ग्रामीण विकास और कृषि को प्राथमिकता
  • भ्रष्टाचार के विरुद्ध कड़े कदम
  • विदेशी ऋणों पर निर्भरता कम करने की दिशा में प्रयास

हालाँकि, आर्थिक मोर्चे पर विशेष उपलब्धि नहीं दिखाई देती क्योंकि गठबंधन सरकार की आंतरिक अस्थिरता और विचारधारात्मक मतभेद विकास के रास्ते में बाधा बने।

(घ) प्रशासनिक पारदर्शिता और अनुशासन

मोरारजी देसाई व्यक्तिगत तौर पर अत्यंत सादगीपूर्ण और अनुशासित थे।

  • वे सुबह 4 बजे उठते
  • योग और प्राणायाम करते
  • नशा-मुक्त और मांस-मुक्त जीवन जीते

उन्होंने सभी मंत्रियों से भी अनुशासन और ईमानदारी की अपेक्षा की। उनका कहना था:
“सत्ता सेवा का माध्यम है, विशेषाधिकार नहीं।”

(ङ) जनता पार्टी की अंदरूनी कलह

मोरारजी देसाई का सबसे बड़ा संकट पार्टी की अंदरूनी कलह थी।
जनता पार्टी में विभिन्न विचारधाराओं के लोग शामिल थे —

  • जनसंघ (हिंदुत्व विचारधारा)
  • समाजवादी (समाजवाद के समर्थक)
  • पूर्व कांग्रेस (ओ) नेता
  • लोकदल (चारण और किसान नेतृत्व)

ये सभी एकजुट तो हुए थे, परंतु टिक नहीं पाए।
मुख्य टकराव था:

  • मोरारजी देसाई
  • चौधरी चरण सिंह
    के बीच।
    दूसरी ओर जनसंघ के नेताओं पर “दोहरी सदस्यता” का आरोप लगाया गया, जिससे विवाद और बढ़ा।

इन कलहों के कारण सरकार कमजोर होती गई।

5. सरकार का पतन

जनता पार्टी की अंदरूनी लड़ाई चरम पर पहुँची और 1979 में चरण सिंह और जनसंघ समूह के समर्थन वापस लेने पर मोरारजी देसाई की सरकार गिर गई। उन्होंने इस्तीफा दे दिया।

इसके बाद चरण सिंह कुछ समय के लिए प्रधानमंत्री बने लेकिन बिना बहुमत के वे भी टिक नहीं पाए। 1980 में पुनः चुनाव हुए और इंदिरा गांधी सत्ता में लौटीं।

6. मोरारजी देसाई का बाद का जीवन

प्रधानमंत्री पद से हटने के बाद मोरारजी देसाई सक्रिय राजनीति से धीरे-धीरे दूर हो गए। वे 99 वर्ष की आयु तक जीवित रहे, और 1991 में उन्हें भारत रत्न से सम्मानित किया गया।

1995 में 10 अप्रैल को उनका निधन हो गया।

7. मोरारजी देसाई की उपलब्धियाँ और आलोचनाएँ

उपलब्धियाँ

  1. भारत के पहले गैर-कांग्रेसी प्रधानमंत्री
  2. लोकतंत्र की पुनर्स्थापना में महत्वपूर्ण भूमिका
  3. प्रेस और नागरिक अधिकारों की बहाली
  4. भ्रष्टाचार-विरोधी सख्त रुख
  5. आपातकाल की गलतियों की जांच
  6. सादगी और नैतिकता का उदाहरण

आलोचनाएँ

  1. जनता पार्टी की अंदरूनी कलह रोकने में असफल
  2. गठबंधन राजनीति संभालने में कठिनाई
  3. अर्थव्यवस्था में ठोस प्रगति नहीं
  4. कुछ मामलों में अत्यधिक कठोर रुख

8. ऐतिहासिक महत्व

मोरारजी देसाई का प्रधानमंत्री कार्यकाल भले ही छोटा रहा हो, लेकिन उसका महत्व अत्याधिक है। वे आपातकाल के बाद लोकतंत्र को पुनःबल देने वाले नेता थे। उन्होंने यह साबित किया कि भारत की राजनीति केवल एक पार्टी पर निर्भर नहीं है और लोकतंत्र में परिवर्तन स्वाभाविक प्रक्रिया है।

उनका जीवन सिद्धांतों और ईमानदारी का प्रतीक है। वे भारतीय राजनीति में उस युग के प्रतिनिधि माने जाते हैं जब नैतिकता और चरित्र को सर्वोच्च महत्व दिया जाता था।


मोरारजी देसाई की खास बातें

मोरारजी देसाई भारतीय राजनीति के उन विरले नेताओं में गिने जाते हैं जिन्हें उनकी ईमानदारी, सादगी, प्रतिबद्धता और अनुशासन के लिए याद किया जाता है। भारत के चौथे और पहले गैर–कांग्रेसी प्रधानमंत्री के रूप में उन्होंने देश की राजनीति में एक नई दिशा दी। उनका जीवन एक ऐसे तपस्वी राजनेता की कहानी है जिसने व्यक्तिगत आदर्शों के साथ कोई समझौता नहीं किया। यहाँ उनकी प्रमुख खासियतों और व्यक्तित्व की विशिष्टताओं को विस्तार से समझा गया है।


1. अद्वितीय ईमानदारी और नैतिकता

मोरारजी देसाई का नाम भारतीय राजनीति में ईमानदारी का पर्याय माना जाता है। वे भ्रष्टाचार के खिलाफ अत्यंत दृढ़ थे और किसी भी परिस्थिति में अपने सिद्धांतों से समझौता नहीं करते थे।
उनके कार्यकाल में ऐसे कई उदाहरण देखने को मिले जहाँ उन्होंने अपनी पार्टी के नेताओं तक पर कार्रवाई का दबाव बनाए रखा। कहा जाता है कि प्रधानमंत्री रहते हुए उन्होंने अपने किसी भी रिश्तेदार को विशेष लाभ देने से स्पष्ट इनकार किया था।
उनकी व्यक्तिगत संपत्ति नगण्य रही। वे जीवनभर सादगी से रहे, सार्वजनिक धन के दुरुपयोग को पाप मानते थे और अपने मंत्रालयों में भी खर्च पर कठोर नियंत्रण रखते थे।


2. अनुशासन का जीवंत प्रतीक

उनका जीवन पूर्णतः अनुशासित था। वे प्रतिदिन सुबह 4 बजे उठते थे, योग और ध्यान करते थे और पूरी सादगीपूर्ण दिनचर्या का पालन करते थे। यह अनुशासन सिर्फ व्यक्तिगत जीवन तक सीमित नहीं था—सरकारी कार्यालयों में भी वे समय की पाबंदी और नियमों का कड़ाई से पालन करवाते थे।
वे मानते थे कि एक नेता को पहले स्वयं अनुशासित होना चाहिए। इसी आदत ने उन्हें 99 वर्ष की लंबी आयु भी प्रदान की।


3. सादगी और संतुलित जीवन

मोरारजी देसाई की जीवनशैली अत्यंत सरल थी। वे महंगे कपड़े या विलासिता की किसी वस्तु के शौकीन नहीं थे।
प्रधानमंत्री रहते हुए भी वे वही सादा खानपान और सरल जीवनचर्या अपनाते थे जो वे साधारण दिनों में करते थे। न तो वे तड़क-भड़क पसंद करते थे और न ही सरकारी सुविधाओं का दुरुपयोग करते थे।
वे खानपान में सादगी और प्राकृतिक जीवनशैली पर जोर देते थे। शराब, सिगरेट या तमाम प्रकार के नशों से वे हमेशा दूर रहे।


4. परम गांधीवादी विचारधारा

मोरारजी देसाई का जीवन मानो गांधीवादी मूल्यों का व्यावहारिक रूप था।

  • सत्य
  • अहिंसा
  • संयम
  • स्वच्छता
  • आत्म–अनुशासन
  • जनता की सेवा

इन सभी सिद्धांतों पर वे कड़ाई से चलते थे। गांधीजी को वे आदर्श मानते थे और उनके विचारों के अनुरूप ‘‘सत्य’’ को सर्वोपरि रखते थे।
उन्होंने अपने कार्यकाल में कई बार कहा कि ‘‘राजनीति में सफल होने से अधिक महत्वपूर्ण है—ईमानदार बने रहना।’’


5. कठोर और साहसी प्रशासक

चाहे बॉम्बे राज्य के मुख्यमंत्री हों या भारत के वित्त मंत्री—मोरारजी देसाई एक बेहद कठोर प्रशासक माने जाते थे।
वे गलत कार्य के लिए किसी को भी डाँटने में संकोच नहीं करते थे। कई बार उनके फैसले कठोर तो होते थे, लेकिन न्यायपूर्ण और निष्पक्ष होते थे।
उनकी प्रशासनिक क्षमता के कारण ही वे प्रधानमंत्री पद तक पहुँचे।
आपातकाल के दौरान भी उन्होंने अपने विचारों से समझौता नहीं किया और लोकतंत्र की पुनर्स्थापना के लिए संघर्ष किया।


6. लोकतंत्र और नैतिक राजनीति के प्रति प्रतिबद्धता

आपातकाल (1975–77) के समय जब लोकतंत्र खतरे में था, मोरारजी देसाई ने खुलकर इसका विरोध किया।
वे जेल गए, आंदोलन में सहयोग किया और लोकतंत्र की रक्षा के प्रति अडिग रहे।
आपातकाल समाप्त होने के बाद जनता पार्टी की सरकार बनी और वे प्रधानमंत्री बने।
उनका सत्ता में आना इस बात का प्रतीक था कि भारतीय जनता ने सत्य, ईमानदारी और लोकतंत्र की रक्षा करने वालों को समर्थन दिया।


7. अंतरराष्ट्रीय मंच पर शांतिदूत की छवि

प्रधानमंत्री के रूप में मोरारजी देसाई विश्व शांति के प्रबल समर्थक थे।
वे किसी भी प्रकार की हथियार–दौड़ के विरोधी थे और अंतरराष्ट्रीय तनाव को कम करने के पक्ष में रहते थे।
उनके चीन और पाकिस्तान के साथ संबंध सुधारने के कार्यों की विदेशों में सराहना हुई।
उन्होंने भारत की परमाणु नीति को संयमित रखा और शांति–आधारित कूटनीति अपनाई, जिससे उनकी छवि ‘‘शांतिदूत’’ जैसी बनी।


8. योग और प्राकृतिक जीवन के प्रबल समर्थक

मोरारजी देसाई को योग, ध्यान और प्राकृतिक चिकित्सा से गहरा लगाव था।
वे मानते थे कि स्वास्थ्य का आधार प्रकृति और आत्म–अनुशासन में है।
उनकी लंबी आयु और फुर्ती को लोग प्राकृतिक जीवनशैली का परिणाम मानते थे।
उन्होंने कई अवसरों पर कहा कि योग सिर्फ शरीर नहीं, बल्कि मन को भी स्वस्थ करता है।
उनकी दिनचर्या सादगी, संयम और प्राकृतिक जीवन की मिसाल थी।


9. विवादों से मुक्त साफ–सुथरी सार्वजनिक छवि

मोरारजी देसाई विरले नेताओं में से थे जिनका जीवन लगभग विवाद–रहित रहा।
सत्ता में रहते हुए या सत्ता के बाहर—उन पर भ्रष्टाचार का कोई बड़ा आरोप नहीं लगा।
वे राजनीतिक लाभ पाने के लिए कभी गलत रास्ते पर नहीं चले।
यह बात आज के समय में उन्हें और भी खास बनाती है।


10. अंतिम समय तक सक्रिय और सिद्धांतवादी

मोरारजी देसाई ने राजनीति में 60 से अधिक वर्षों तक सक्रिय भूमिका निभाई।
वे 99 वर्ष की उम्र तक मानसिक रूप से पूरी तरह सक्रिय और स्पष्टवादिता से भरे रहे।
अंतिम दिनों में भी उन्होंने अपने सिद्धांतों को नहीं छोड़ा और पूरी सादगी के साथ जीवन व्यतीत किया।
उनके निधन (1995) के बाद पूरा देश उन्हें एक सच्चा, ईमानदार और अनोखा नेता मानकर श्रद्धांजलि देता रहा।


मोरारजी देसाई को मिले पुरस्कार – 

मोरारजी देसाई भारतीय राजनीति के उन विरले नेताओं में से हैं जिन्हें उनकी ईमानदारी, अनुशासन, सरलता और आदर्शवादी जीवन-शैली के लिए आज भी याद किया जाता है। उनका सार्वजनिक जीवन छह दशक से अधिक रहा और इसमें उन्होंने देश की राजनीति को न केवल दिशा दी, बल्कि शासन प्रणाली और प्रशासन में नैतिक मूल्यों को स्थापित करने का प्रयास भी किया। उनकी इसी निष्कलंक छवि और राष्ट्रसेवा के कारण उन्हें विभिन्न स्तरों पर सम्मानित किया गया। उनमें सबसे महत्वपूर्ण है भारत रत्न, जो भारत का सर्वोच्च नागरिक सम्मान है।

भारत रत्न (1991)

मोरारजी देसाई को 1991 में भारत रत्न से सम्मानित किया गया। यह भारत सरकार द्वारा दिया जाने वाला सर्वोच्च नागरिक पुरस्कार है, जो केवल उन व्यक्तियों को मिलता है जिन्होंने देश की प्रगति, सामाजिक उत्थान, सांस्कृतिक विकास या राष्ट्रीय सेवा में असाधारण योगदान दिया हो। मोरारजी देसाई को यह सम्मान उनकी लंबी सार्वजनिक सेवा, लोकतंत्र की पुनर्स्थापना में योगदान और गांधीवादी आदर्शों के पालन के लिए दिया गया।

आपातकाल (1975–1977) की समाप्ति के बाद जब जनता पार्टी की सरकार बनी, तब मोरारजी देसाई देश के पहले गैर-कांग्रेसी प्रधानमंत्री बने। उन्होंने अपने कार्यकाल में लोकतांत्रिक संस्थाओं को मजबूत किया, प्रेस की स्वतंत्रता को बहाल किया और सरकारी प्रणाली में पारदर्शिता लाने का प्रयास किया। उनके इन प्रयासों ने भारत के लोकतंत्र को स्थायी मजबूती प्रदान की, जिसके लिए उन्हें उच्च राष्ट्रीय सम्मान प्राप्त हुआ।

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता

मोरारजी देसाई केवल भारत ही नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी सम्मानित व्यक्ति थे। पड़ोसी देशों के साथ शांति, संयमित विदेश नीति और विश्व शांति पर उनके विचारों की वैश्विक स्तर पर प्रशंसा हुई। हालांकि उन्हें औपचारिक रूप से कोई बड़ा विदेशी पुरस्कार नहीं मिला, लेकिन विदेशी राष्ट्राध्यक्षों और नेताओं ने उन्हें कई बार सम्मानित किया और उनके नेतृत्व की सराहना की।

जीवन-शैली और आदर्शों के लिए सम्मान

मोरारजी देसाई ने राजनीति में रहते हुए कभी सिद्धांतों से समझौता नहीं किया। वे जीवन भर गांधीजी के शब्दों पर चलते रहे—सत्य, अहिंसा, सादगी और नैतिकता। वे भ्रष्टाचार के सख्त विरोधी थे और अपनी प्रशासनिक सख्ती के लिए जाने जाते थे। उनकी ईमानदारी के किस्से आज भी लोगों की प्रेरणा का स्रोत हैं। समाज के विभिन्न संगठनों ने उन्हें अनेक बार सम्मानित किया और “सत्यनिष्ठ राजनेता” का दर्जा दिया।

लोकतांत्रिक मूल्यों के रक्षक के रूप में सम्मान

आपातकाल के बाद लोकतंत्र को फिर से खड़ा करने में उनकी भूमिका ऐतिहासिक मानी जाती है। उन्होंने नागरिक अधिकारों को बहाल किया और सरकार की शक्तियों को जनता के हित में नियंत्रित करने का प्रयास किया। इसी योगदान के लिए उन्हें “लोकतंत्र के प्रहरी” के रूप में भी सम्मानित किया जाता है।


मोरारजी देसाई की मृत्यु – 

मोरारजी देसाई भारतीय राजनीति के उन व्यक्तित्वों में से एक थे जिनका पूरा जीवन सत्य, ईमानदारी, सादगी और नैतिक मूल्यों के लिए समर्पित रहा। उन्होंने लगभग सौ वर्ष का लंबा जीवन जिया और अपनी अंतिम साँस तक अनुशासन एवं संयम का अद्भुत उदाहरण बने रहे। उनका निधन 10 अप्रैल 1995 को मुंबई में हुआ। वे लगभग 99 वर्ष के थे और अपनी लंबी आयु का श्रेय प्राकृतिक चिकित्सा, योग, सादगीपूर्ण आहार और कठोर दिनचर्या को देते थे।

मृत्यु से कुछ समय पहले तक वे शारीरिक रूप से काफी कमजोर होने लगे थे। उम्र के कारण उनका स्वास्थ्य धीरे-धीरे गिरने लगा था। अंतिम वर्षों में वे सार्वजनिक जीवन से लगभग दूर हो चुके थे, हालाँकि देश-विदेश के कई नेता समय-समय पर उनसे मिलने आते थे। उनकी सोच, अनुभव और राजनीतिक समझ उनकी वृद्धावस्था में भी उतनी ही प्रभावी मानी जाती थी।

उनके निधन से कुछ सप्ताह पहले उन्हें उम्र संबंधी सामान्य बीमारियाँ सताने लगीं। हालाँकि कोई बड़ी बीमारी नहीं थी, परन्तु 99 वर्ष की उम्र में शरीर स्वाभाविक रूप से काफी कमजोर हो चुका था। वे मुंबई के मालाबार हिल स्थित अपने निवास पर शांत जीवन बिता रहे थे। 10 अप्रैल 1995 की सुबह उनकी तबीयत अचानक बिगड़ गई और उन्होंने शांति से अंतिम साँस ली।

उनकी मृत्यु के बाद पूरे देश में शोक की लहर दौड़ गई। राजकीय स्तर पर उनके योगदान को याद किया गया। भारत के पहले गैर-कांग्रेसी प्रधानमंत्री होने के नाते वे लोकतांत्रिक इतिहास में विशेष स्थान रखते थे। उनके जाने से उस पीढ़ी का अंत माना गया जिसने स्वतंत्रता संग्राम, आजादी का उत्साह और भारतीय लोकतंत्र की शुरुआती चुनौतियों को अपनी आँखों से देखा था।

उनके पार्थिव शरीर को अंतिम दर्शन के लिए रखा गया, जहाँ बड़ी संख्या में लोग, राजनेता, सामाजिक कार्यकर्ता और आम नागरिक उन्हें श्रद्धांजलि देने पहुँचे। उनकी अंतिम यात्रा अत्यंत सरल थी, बिल्कुल उनके जीवन की तरह। वे वैभव, विलासिता और दिखावे से हमेशा दूर रहे, और मृत्यु के बाद भी उनके परिवार ने उसी सादगी को कायम रखा।

मोरारजी देसाई का निधन केवल एक नेता का अंत नहीं था, बल्कि एक ऐसी विचारधारा का अंत भी था जो राजनीति को सेवा और तपस्या का माध्यम मानती थी। वे अपनी कठोर आत्मानुशासन, निडर स्वभाव और गहरी नैतिकता के लिए हमेशा याद किए जाएँगे। अपने जीवनकाल में उन्होंने जनता पार्टी को नेतृत्व दिया, आपातकाल के बाद देश में लोकतंत्र को मजबूत किया और अपनी ईमानदार कार्यशैली से राजनीति को एक नया आयाम दिया।

आज भी उनकी मृत्यु भारतीय इतिहास में एक अध्याय के रूप में दर्ज है, जहाँ एक ऐसे व्यक्तित्व को विदाई मिली जिसने लगभग एक सदी तक देश के राजनीतिक और सामाजिक जीवन को प्रभावित किया। मोरारजी देसाई भले ही आज इस दुनिया में नहीं हैं, लेकिन उनकी विचारधारा, सिद्धांत और सादगी की मिसाल आने वाली पीढ़ियों को प्रेरणा देती रहेगी।


 संक्षेप

मोरारजी रणछोड़जी देसाई (29 फ़रवरी 1896 – 10 अप्रैल 1995) भारत के ऐसे राजनेता थे जिन्होंने अपने सिद्धांतों, सत्यवादिता और सादगीपूर्ण जीवन के कारण भारतीय राजनीति में एक अलग पहचान बनाई। वे देश के चौथे प्रधानमंत्री और पहले गैर-कांग्रेसी प्रधानमंत्री थे। उनका जन्म गुजरात के भदेली गाँव में हुआ था। उनके पिता रणछोड़जी देसाई एक स्कूल शिक्षक थे, इसलिए बचपन से ही शिक्षा एवं अनुशासन का वातावरण मिला। मोरारजी देसाई ने अपनी प्रारंभिक पढ़ाई गाँव में और उच्च शिक्षा बम्बई में पूरी की। उन्होंने बॉम्बे प्रेसीडेंसी में नौकरी शुरू की, लेकिन स्वतंत्रता आंदोलन की लहर और गांधीजी के विचारों ने उन्हें प्रशासनिक सेवा छोड़ने और देश की आज़ादी के संघर्ष में कूदने के लिए प्रेरित किया।

स्वतंत्रता आंदोलन में उन्होंने सत्याग्रहों और आंदोलनों में सक्रिय भूमिका निभाई। वे 1930 के नमक सत्याग्रह और अन्य आंदोलनों के दौरान कई बार जेल गए। आज़ादी के बाद भी उन्होंने कभी अपने सिद्धांतों से समझौता नहीं किया। स्वतंत्र भारत में उनका राजनीतिक सफर एक प्रशासनिक अधिकारी से लेकर मुख्यमंत्री, वित्त मंत्री, उपप्रधानमंत्री और अंततः प्रधानमंत्री तक पहुँचा। 1952 से 1956 तक वे बॉम्बे स्टेट के मुख्यमंत्री रहे और अपने सख्त प्रशासन के लिए प्रसिद्ध हुए। बाद में वे भारत के वित्त मंत्री बने, जहाँ उन्होंने ईमानदारी और पारदर्शिता पर जोर दिया।

1975 के आपातकाल के समय उन्होंने इंदिरा गांधी सरकार का खुलकर विरोध किया और जेल भी गए। आपातकाल समाप्त होने के बाद 1977 में हुए चुनावों में जनता पार्टी ने ऐतिहासिक जीत दर्ज की और मोरारजी देसाई भारत के पहले गैर-कांग्रेसी प्रधानमंत्री बने। उनके नेतृत्व में लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं को पुनर्स्थापित किया गया। उन्होंने प्रेस की स्वतंत्रता बहाल की और आपातकाल के दौरान हुए अत्याचारों की जांच के लिए शाह आयोग बनाया। विदेश नीति में उन्होंने शांति और संतुलन पर जोर दिया। वे भारत-चीन और भारत-पाक संबंधों को बेहतर बनाने के समर्थक थे। उन्होंने परमाणु नीति में संयम बरतने की बात कही और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की छवि को शांतिप्रिय राष्ट्र के रूप में मजबूत किया।

मोरारजी देसाई का व्यक्तित्व सादगी, योग, प्राकृतिक चिकित्सा और कठोर दिनचर्या से जुड़ा था। वे सुबह जल्दी उठते, नियमित योग करते और संतुलित जीवन जीते थे। वे चरम ईमानदारी और निष्ठा के प्रतीक माने जाते थे। उनका जीवन नशा-मुक्त, भ्रष्टाचार-मुक्त और नैतिक मूल्यों पर आधारित था। राजनीतिक मतभेदों के बावजूद, उनके विरोधी भी उनकी ईमानदारी का सम्मान करते थे।

उनके कार्यकाल में जनता पार्टी के अंदर मतभेद बढ़े, जिसके कारण 1979 में उन्हें प्रधानमंत्री पद छोड़ना पड़ा। राजनीति से संन्यास लेने के बाद भी वे सार्वजनिक जीवन में सक्रिय रहे। 1991 में भारत सरकार ने उन्हें देश का सर्वोच्च सम्मान भारत रत्न प्रदान किया। 10 अप्रैल 1995 को 99 वर्ष की आयु में उनका निधन हुआ।

मोरारजी देसाई भारतीय राजनीति के उन दुर्लभ नेताओं में से थे जिन्होंने अपने सिद्धांतों, सादगी, नैतिक मूल्यों और अडिग ईमानदारी से देश के इतिहास में स्थायी छाप छोड़ी।


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